आज के महत्वपूर्ण सामान्य ज्ञान में छत्तीसगढ़ में स्वतंत्रता आंदोलन संबंधित जानकारियाँ पढ़े -Read information related to freedom movement in Chhattisgarh in today’s important general knowledge.

आज के महत्वपूर्ण सामान्य ज्ञान में छत्तीसगढ़ में स्वतंत्रता आंदोलन संबंधित जानकारियाँ  पढ़े  -Read information related to freedom movement in Chhattisgarh in today’s important general knowledge.

छत्तीसगढ़ में स्वतंत्रता आंदोलन


1885 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना के बाद विभिन्न क्षेत्रों में राष्ट्रीयता की भावना में वृद्धि हुई। छत्तीसगढ़ में राष्ट्रीय विचारधारा का प्रभाव पड़ा छत्तीसगढ़ के अनेक नेताओं ने कांग्रेस के अधिवेशन में भाग लिया और अधिवेशन में लिए गए निर्णय पारित प्रस्तावों के आधार पर क्षेत्र में राष्ट्रीय आंदोलन को गति देने का प्रयास किया

राष्ट्रीय चेतना का विकास

1889 में कांग्रेस के मुंबई अधिवेशन में मध्य प्रांत एवं बरार के प्रतिनिधि के रूप में अनेक प्रमुख नेताओं ने भाग लिया। छत्तीसगढ़ क्षेत्र से भी पं. माधवराव सप्रे, वामनराव लाखे, सी.एम. ठक्कर, पं. रामदयाल तिवारी जैसे प्रमुख नेताओं ने भाग लिया और अधिवेशन से वापस आने पर छत्तीसगढ़ के क्षेत्र में कांग्रेस व राष्ट्रीयता के विचारों को विस्तारित करने का कार्य किया। 1891 में मध्य प्रांत एवं बरार की राजधानी नागपुर में कांग्रेस का अधिवेशन संपन्न हुआ। 

इस अधिवेशन में किसानों पर लगाए जाने वाले विभिन्नकरों का विरोध किया गया, विशेषकर नहर व जंगल पर लगाए जाने वाले करों का विरोध करते हुए प्रस्ताव पारित किए गए। छत्तीसगढ़ से अनेक प्रमुख नेताओं ने इसमें भाग लिया जिसमें पं. माधवराव सप्रे, वामनराव लाखे, सी.एम. ठक्कर, पं. रामदयाल तिवारी, बद्री प्रसाद साव जैसे नेता शामिल थे, जिन्होंने अधिवेशनवापस आकर नहर व जंगल करों को वापस लिए जाने की मांग उठाई।1899-1900 के मध्य भारत के विभिन्न क्षेत्रों में भीषण अकाल कीस्थिति उत्पन्न हुई। छत्तीसगढ़ में अकाल की चपेट में था जिससे किसानों की दशा बिगड़ी परंतु सरकार ने इस समस्या से निपटने के लिए कोई निश्चित कदम नहीं उठाए, इससे आम जनता में भारी असंतोष उत्पन्न हुआ तथा अंग्रेजी सरकार विरोधी विचारधाराएं बढ़ने लगी।

राष्ट्रीय संस्थाओं का गठन

19 वी सदी के अंत तथा बीसवीं सदी के प्रारंभ में छत्तीसगढ़ के विभिन्न क्षेत्रों में विभिन्न राष्ट्रीय संस्थाओं के गठन का स्थानीय स्तर पर प्रभाव पड़ा। स्थानीय स्तर पर पीपुल-टीचर्स एसोसिएशन, राजिम कवि समाज, रीडिंग क्लब रायपुर, बंगाल नागपुर रेलवे एसोसिएशन जैसी अनेक संस्थाएं स्थापित हुई। इन संस्थाओं ने लोगों को जागरूक करने में प्रमुख भूमिका निभाई।

पत्र-पत्रिकाओं की भूमिका

देश के अन्य भागों की तरह छत्तीसगढ़ में भी समाचार पत्र जनजागृति का माध्यम बने। इस क्रम में वर्ष 1900 में माधव राव सप्रे द्वारा प्रकाशित छत्तीसगढ़ मित्र नामक पत्र ने उल्लेखनीय भूमिका निभाई। आर्थिक अभाव तथा शासकीय दमन के बाद भी सप्रे जी ने इस पत्र का प्रकाशन जारी रखा जिसके द्वारा छत्तीसगढ़ में बौद्धिक जागरूकता बनाने में मदद मिली। 

अन्य पत्र पत्रिकाएं-

  • सरस्वती (1900) पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी
  • हिंद केसरी (1908) – माधव राव सप्रे
  • सरस्वती पुस्तकालय (1909) ठाकुर प्यारेलाल सिंह
  • कर्मवीर माखनलाल चतुर्वेदी
  • श्री कृष्ण जन्म स्थली (जेल पत्रिका) (1922)- पं. सुंदरलाल शर्मा

बंगाल विभाजन और राष्ट्रीयता का विस्तार

1905 में लॉर्ड कर्जन द्वारा बंगाल विभाजन की योजना लागू की गई। इस घटना का न सिर्फ बंगाल में बल्कि भारत के अनेक क्षेत्रों में विरोध हुआ। इस आंदोलन के विरोध स्वरूप स्वदेशी को बढ़ावा मिला। 

छत्तीसगढ़ में भी विभिन्न क्षेत्र में स्वदेशी विचारधारा के प्रति लोगों की इस आंदोलन ने जागरूक किया। स्वदेशी आंदोलन के प्रभाव स्वरूप छत्तीसगढ़के विभिन्न क्षेत्रों में विशेषकर धमतरी, महासमुंद, राजनांदगांव आदि क्षेत्र में खादी का प्रचार हुआ। छत्तीसगढ़ में स्वदेशी को बढ़ावा देने में पं. सुंदरलाल शर्मा, नारायणराव मेघावाले, ठाकुर प्यारेलाल सिंह जैसे नेताओं की भूमिका प्रमुख रही।  

सुंदरलाल शर्मा द्वारा सन्मित्र मंडल (1906) की स्थापना

सूरत विभाजन 1907 का छत्तीसगढ़ में प्रभाव

1907 में कांग्रेस का वार्षिक अधिवेशन गुजरात के सूरत शहर में आयोजित की गयी जिसमें अधिवेशन की अध्यक्षता को लेकर नरमपंथी व गरमपंथी विचारधारा के नेताओं मध्य मतभेद स्पष्ट रूप से उभकर आया। सुंदरलाल शर्मा ने इस अधिवेश में छत्तीसगढ़ का प्रतिनिधित्व किया इसके अलावा पं. नारायण राव मेघावाले तथा डॉ. शिवराम मुंजे जैसे नेता भी शामिल हुए।

कांग्रेस के सूरत अधिवेशन का छत्तीसगढ़ कांग्रेस पर भी प्रभाव पड़ा। यहां के नेताओं में पं. रविशंकर शुक्ल, ई राघवेंद्र राव, बैरिस्टर छेदीलाल, माधव राव सप्रे, लक्ष्मण राव उदगीरकर, दादा साहब खापर्डे जैसे नेता तिलक के आक्रामक विचारों के समर्थक थे। वहीं डॉ. हरिसिंह गौर, डॉ. मुंजे, देवेन्द्रनाथ चौधरी आदि उदारवादी विचारधारा के पक्ष में थे।

बंग-भंग आंदोलन 1905

स्वदेशी व बहिष्कार : वामन राव लाखे, माधव राव सप्रे के नेतृत्व में आंदोलन

सन्मित्र मण्डल की स्थापना 1906

: पं. सुन्दर लाल शर्मा 1906 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के सदस्य बने तथा उन्होंने इसी वर्ष सन्मित्र मण्डल की स्थापना की

छत्तीसगढ़ में होमरूल लीग आंदोलन 1916

कांग्रेस के सूरत विभाजन के बाद राष्ट्रीय आंदोलन धीमा पड़ गया तब  होमरूल लीग आंदोलन के द्वारा राष्ट्रीय आंदोलन को पुनः स्थापित करने व गति देने का प्रयास किया। मध्य प्रांत एवं बरार में तिलक जी के नेतृत्व में होमरूल लीग आंदोलन की शुरुआत हुई।

छत्तीसगढ़ में भी होमरूल लीग आंदोलन का व्यापक प्रभाव पड़ा, रायपुर बिलासपुर, राजनांदगांव तथा दुर्ग जैसे क्षेत्रों में होमरूल लीग का प्रभाव पड़ा। छत्तीसगढ़ में रायपुर से आंदोलन का आरंभ पं. रविशंकर शुक्ल द्वारा किया गया। इसमें इनके प्रमुख सहयोगी पं. माधव राव सप्रे, मूलचंद बागड़ी, लक्ष्मण राव उदगीरकर आदि शामिल थे।

बिलासपुर में ई राघवेंद्र राव, द्वारिका प्रसाद तिवारी, अंबिका प्रसादवर्मा जैसे लोगों ने आंदोलन को संचालित किया। दुर्ग में घनश्याम सिंह गुप्त के

नेतृत्व में तथा राजनांदगांव में ठाकुर प्यारेलाल सिंह के नेतृत्व में होमरूल लीग आंदोलन संचालित कर विभिन्न शाखाओं की स्थापना की गई1918 में रायपुर में होमरूल लीग की शाखा स्थापित की गई।मॉटेग्यू की अगस्त घोषणा के बाद एनी बेसेंट ने खुद को आंदोलन से अलग कर लिया तथा तिलक को अपने विरुद्ध एक मुकदमे के कारण लंदन जाना पड़ा और होमरूल लीग का प्रभाव समाप्त हो गया।

अन्य घटनाएं

  • रायपुर में 1918 में प्रांतीय राजनीतिक सम्मेलन आयोजित किया गया।
  • इस सम्मेलन में पं. रविशंकर शुक्ल, माधव राव सप्रे, वामनराव लाखे, घनश्याम गुप्त व पं. रामदयाल तिवारी के द्वारा महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वहन कियासिंह गया।

सरस्वती पुस्तकालय 1909

  • स्थान : राजनांदगांव
  • संस्थापक: ठा, प्यारेलाल सिंह
  • सहयोगी: गज्जू लाल शर्मा, छवि लाल चौबे
  • विशेष : राष्ट्रीयता की भावना को विकसित करने में इस संस्था ने राजनांदगांव में महत्वपूर्ण योगदान दिया।

छत्तीसगढ़ में होमरूल लीग

  • स्थापना : तिलक द्वारा प्रारंभ होमरूल लीग की क्षेत्रीय शाखा 1917 में स्थापित हुई
  • रायपुर में नेतृत्व: पं. रविशंकर शुक्ल, लक्ष्मणराव उदगीरकर, मूलचंद बागड़ी
  • बिलासपुर में नेतृत्व : ई. राघवेन्द्र राव
  • दुर्ग में नेतृत्व : घनश्याम सिंह गुप्त
  • राजनांदगांव में नेतृत्व : ठा. प्यारेलाल सिंह
  • विशेष : 1918 में रायपुर में पं. रविशंकर शुक्ल की अध्यक्षता में होमरूल लीग का क्षेत्रीय सम्मलेन हुआ

खिलाफत आंदोलन और छत्तीसगढ़ 1920

  • रायपुर: पंडित रविशंकर शुक्ल, असगर अली
  • बिलासपुर: वजीर खां, अकबर खां, हकीम अजमल खां
  • विशेष पं. रविशंकर शुक्ल ने कहा- ‘अब हम लोग हिंदू और मुसलमान नहीं रहे बल्कि अब सही अर्थों में हिंदुस्तानी है।